एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। उत्तराखण्ड के टिहरी जनपद के भिलंगना विकासखंड में बालगंगा और धर्मगंगा नदियों के पवित्र संगम पर स्थित बूढ़ा केदार मंदिर सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
बूढ़ा केदार उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल के घनसाली क्षेत्र में बाल गंगा और धर्म गंगा नदियों के संगम पर स्थित एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र तीर्थस्थल है। पंच केदार परंपरा का एक महत्वपूर्ण और प्रारंभिक धाम माना जाने वाला यह स्थान अपनी गहरी आध्यात्मिक और पौराणिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपने पापों (गोत्र हत्या) से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव की खोज में हिमालय आए थे। भगवान शिव उनसे छिपने के लिए एक बैल के रूप में अंतर्ध्यान हो गए और बाद में एक वृद्ध (बूढ़ा) व्यक्ति के रूप में इसी संगम पर प्रकट हुए। स्कंद पुराण के अनुसार, इस पवित्र स्थान की यात्रा किए बिना चार धाम की यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती। मंदिर में स्थापित प्राकृतिक शिवलिंग को उत्तर भारत का सबसे विशाल प्राकृतिक शिवलिंग माना जाता है। इस शिवलिंग पर वृद्ध शिव, गणेश, नंदी के साथ ही पांचों पांडवों और द्रौपदी की छवियां प्राकृतिक रूप से अंकित हैं। मंदिर पारंपरिक गढ़वाली वास्तुकला, पत्थर के काम और नक्काशीदार लकड़ी का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। समुद्र तल से लगभग 1,535 मीटर (या 2,277 मीटर ट्रैक क्षेत्र) की ऊंचाई पर बसा यह क्षेत्र घने देवदार के जंगलों, सीढ़ीनुमा खेतों और सुंदर घाटियों से घिरा हुआ है। यह स्थान पर्यटकों के लिए भी एक शानदार ट्रेकिंग स्थल है। यह तीर्थ नई टिहरी से लगभग 90 किलोमीटर की दूरी पर घनसाली में स्थित है। सड़क मार्ग से आप आसानी से यहाँ तक पहुँच सकते हैं। बूढ़ा केदार की यात्रा के लिए सबसे अच्छा समय अप्रैल से जून और सितंबर से नवंबर के बीच का है, जब मौसम बहुत सुहावना और हिमालय के दृश्य स्पष्ट होते हैं। सावन (जुलाई-अगस्त) के महीने में भी यहाँ भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
उत्तराखण्ड राज्य के टिहरी गढ़वाल ज़िले में स्थित एक प्राचीन एवं ऐतिहासिक हिन्दू मंदिर है। यह भगवान शिव को समर्पित है और इस क्षेत्र के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है। यह मंदिर बालगंगा और धर्म गंगा नदियों के संगम पर स्थित है, जो इसे एक पवित्र स्थान बनाता है। मंदिर में स्थापित शिवलिंग को उत्तर भारत के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक माना जाता है। यह स्थान स्थानीय लोगों के लिए “पांचवां केदार” भी माना जाता है और इसकी गहरी पौराणिक मान्यताएं हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बूढ़ा केदार का संबंध महाभारत काल के पांडवों से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए पांडव भगवान शिव का आशीर्वाद लेने हिमालय की ओर आए। भगवान शिव उनसे मिलना नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने एक वृद्ध (बूढ़े) का रूप धारण कर लिया और इसी स्थान पर पांडवों को दर्शन दिए। इसी कारण इस स्थान का नाम “बूढ़ा केदार” पड़ा। एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान शिव ने भैंसे का रूप धारण किया और जब भीम ने उन्हें पकड़ने का प्रयास किया, तो वे धरती में समा गए और उनके शरीर के विभिन्न अंग केदारनाथ, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, मध्यमहेश्वर और कल्पेश्वर में प्रकट हुए, जिन्हें सम्मिलित रूप से पंच केदार कहा जाता है। बूढ़ा केदार को उसी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। बूढ़ा केदार मंदिर, टिहरी गढ़वाल जिले के घनसाली तहसील में स्थित है। यह मंदिर बालगंगा और धर्म गंगा नदी के संगम पर एक शांत और सुरम्य वातावरण में बना हुआ है। निकटतम प्रमुख कस्बे घनसाली और नई टिहरी हैं। यह मंदिर स्थानीय आस्था का एक प्रमुख केंद्र है। महाशिवरात्रि और श्रावण मास के दौरान यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। इसे केदारनाथ यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी माना जाता है और कई तीर्थयात्री केदारनाथ जाने से पहले या बाद में यहाँ दर्शन करना पवित्र मानते हैं। मंदिर परिसर में अन्य देवी-देवताओं के छोटे मंदिर भी स्थापित हैं।