भारत में रेडियो प्रसारण की शुरुआत मुम्बई और कोलकाता में सन 1927 में दो निजी ट्रांसमीटरों से हुई
संदीप गोयल/एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। आकाशवाणी भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन संचालित सार्वजनिक क्षेत्र की रेडियो प्रसारण सेवा है। भारत में रेडियो प्रसारण की शुरुआत मुम्बई और कोलकाता में सन 1927 में दो निजी ट्रांसमीटरों से हुई। 1930 में इसका राष्ट्रीयकरण हुआ और तब इसका नाम भारतीय प्रसारण सेवा (इण्डियन ब्राडकास्टिंग कॉरपोरेशन) रखा गया। बाद में 1957 में इसका नाम बदल कर आकाशवाणी रखा गया। बॉम्बे प्रेसिडेंसी रेडियो क्लब और अन्य रेडियो क्लबों के कार्यक्रमों के साथ ब्रिटिश राज के दौरान जून 1923 में प्रसारण आरम्भ हुआ। 23 जुलाई 1927 को एक समझौते के अनुसार, प्राइवेट इण्डियन ब्रॉडकास्टिंग कम्पनी लिमिटेड को दो रेडियो स्टेशन संचालित करने के लिए अधिकृत किया गया था: बॉम्बे स्टेशन जो 23 जुलाई 1927 को आरम्भ हुआ था, और कलकत्ता स्टेशन जो 26 अगस्त 1927 को आरम्भ हुआ था। कम्पनी चली गई। 1 मार्च 1930 को परिसमापन में सरकार ने प्रसारण सुविधाओं को संभाला और 1 अप्रैल 1930 को दो वर्ष के लिए प्रायोगिक आधार पर भारतीय स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस की शुरुआत की और मई 1932 में स्थायी रूप से ऑल इण्डिया रेडियो बन गया।
आकाशवाणी भारत का राष्ट्रीय सार्वजनिक रेडियो प्रसारक है, जिसकी शुरुआत 1927 में निजी रेडियो केंद्रों के रूप में हुई थी। 1930 में सरकारी अधिग्रहण के बाद, 8 जून 1936 को इसका नाम ‘ऑल इंडिया रेडियो’ पड़ा और 1957 में आधिकारिक रूप से ‘आकाशवाणी’ कहा जाने लगा। यह दुनिया के सबसे बड़े रेडियो नेटवर्क में से एक है, जो ‘बहुजन हिताय: बहुजन सुखाय’ के सिद्धांत पर काम करता है। भारत में रेडियो प्रसारण की शुरुआत जून 1927 में मुंबई और कोलकाता में दो निजी ट्रांसमीटरों के साथ हुई थी। निजी कंपनी के बंद होने के बाद, सरकार ने इसका अधिग्रहण कर लिया और इसे ‘इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस’ नाम दिया। 8 जून 1936 को इसे ‘ऑल इंडिया रेडियो’ (AIR) नाम दिया गया। इसी वर्ष 19 जनवरी को दिल्ली स्टेशन से पहला समाचार बुलेटिन प्रसारित हुआ। 1947 में स्वतंत्रता के समय, AIR के पास 6 स्टेशन थे। 1956 में, मैसूर के प्रोफेसर एम.वी. गोपालस्वामी द्वारा गढ़े गए शब्द ‘आकाशवाणी’ को आधिकारिक रूप से अपनाया गया। लोकप्रिय रेडियो सेवा ‘विविध भारती’ की शुरुआत 1957 में हुई थी। आज आकाशवाणी 500 से अधिक केंद्रों के साथ 23 भाषाओं और 146 बोलियों में कार्यक्रम प्रसारित करता है, जो भारत की 98% से अधिक आबादी तक पहुँचता है।
दक्षिण भारत में ब्रॉडकास्टिंग की नींव…मद्रास रेडियो क्लब, 1924 रेडियो की गूंज जल्द ही भारत के अलग-अलग हिस्सों में फैलने लगी थी। 31 जुलाई 1924 में सी. वी. कृष्णमूर्ति चेट्टी द्वारा स्थापित Madras Presidency Radio Club से दक्षिण भारत में प्रसारण की दिशा में एक महत्वपूर्ण अध्याय की शुरुआत हुई और इंग्लैंड से लाये गए रेडियो उपकरण ने इस पहल को साकार किया। शुरुआत में 40 वॉट के ट्रांसमीटर से प्रसारण किया गया, जिसे बाद में 200 वॉट के अधिक शक्तिशाली ट्रांसमीटर से बदल दिया गया। हर शाम लगभग ढाई घंटे तक संगीत और वार्ताओं का प्रसारण किया जाता था, जो उस समय के श्रोताओं के लिए एक नया और अनोखा अनुभव था। इसी पहल ने दक्षिण भारत में ब्रॉडकास्टिंग की नींव रखी। हालांकि, आर्थिक कठिनाइयों के कारण 1927 में इस सेवा को बंद करना पड़ा।
राजधानी दिल्ली में रेडियो प्रसारण की शुरुआत साल 1936 में भारतीय प्रसारण ने एक और महत्वपूर्ण पड़ाव हासिल किया, जब देश की राजधानी दिल्ली में रेडियो प्रसारण की शुरुआत हुई। 1 जनवरी 1936 को Indian State Broadcasting Service का दिल्ली केंद्र आधिकारिक रूप से ऑन-एयर हुआ। पहले यह केंद्र 18 अलीपुर रोड, दिल्ली स्थित अस्थायी स्टूडियो से संचालित किया जाता था, जबकि इसका 20 किलोवॉट मीडियम वेव ट्रांसमीटर मॉल रोड पर स्थापित था। दिल्ली केंद्र की शुरुआत के साथ ही रेडियो प्रसारण को एक नई दिशा मिली। कला, शिक्षा और संगीत जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ावा मिला, जिससे रेडियो केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि समाज के बौद्धिक और सांस्कृतिक विकास का भी एक सशक्त साधन बन गया। इसी दौर में समाचार सेवा और अनुसंधान विभागों की भी स्थापना की गई, जिसने प्रसारण को और अधिक संगठित और प्रभावी बनाया। धीरे-धीरे, रेडियो एक नए रूप में उभरने लगा, नज़रिया बदलने लगा और एक ऐसे माध्यम के रूप में विकसित होने लगा जो देश को शिक्षा, संस्कृति, ख़बरों और कई जानकारियों से जोड़ता है।
1930 के दशक में, भारत में रेडियो का विस्तार नए-नए रूप लेने लगा था। इसी दौर में, 10 सितंबर 1935 को मैसूर में एक अनोखी पहल हुई, जब ‘आकाशवाणी’ नाम से एक निज़ी रेडियो स्टेशन की शुरुआत हुई, जो भारत का पहला निज़ी प्रसारण केंद्र बना। मनोविज्ञान के प्रोफेसर डॉ. एम. वी. गोपालस्वामी ने अपने घर से मात्र 30 वॉट के ट्रांसमीटर के साथ इस प्रसारण की शुरुआत की। बाद में इसे और अधिक शक्तिशाली ट्रांसमीटर से सुसज्जित किया गया। यह पहल किसी सरकारी योजना का हिस्सा नहीं थी, बल्कि एक व्यक्ति के जुनून और समाज के सहयोग का परिणाम था, जिसने रेडियो को लोगों के और क़रीब ला दिया। ‘आकाशवाणी’, यानी आकाश से आने वाली आवाज़, यह नाम भी यहीं से लोकप्रिय हुआ, जिसने आगे चलकर पूरे देश में रेडियो की पहचान बनायी । समय के साथ, इस सेवा को मैसूर राज्य ने अपने अधीन ले लिया और बाद में यह आकाशवाणी का हिस्सा बन गई।
साल 1936 में भारत में रेडियो ने एक नई भूमिका निभानी शुरू की, जब पहली बार श्रोताओं तक समाचार पहुँचने लगे। 19 जनवरी 1936 को दिल्ली केंद्र से पहला समाचार बुलेटिन प्रसारित किया गया। यह प्रसारण Indian State Broadcasting Service के अंतर्गत शुरू हुआ, जिसने भारत में रेडियो समाचार सेवा की नींव रखी। यह बुलेटिन अंग्रेज़ी और ‘हिंदुस्तानी’, दोनों भाषाओं में प्रस्तुत किया गया, जिससे यह अधिक व्यापक श्रोताओं तक पहुंच सका।
इसके साथ ही, समसामयिक विषयों पर वार्ताओं की भी शुरुआत हुई, जिसने रेडियो को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सूचना और विचार-विमर्श का एक सशक्त मंच बना दिया। यही वह दौर था, जब रेडियो ने देश को जोड़ने के साथ-साथ, उसे जागरूक और सूचित करने की ज़िम्मेदारी भी निभानी शुरू की।