संदीप गोयल/एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिवारों को उत्तराखंड में सरकारी सेवाओं में दिए जा रहे आरक्षण का वास्तविक लाभ वर्तमान व्यवस्था के कारण लगातार सीमित होता जा रहा है। स्वतंत्रता सेनानी परिवारों के हितों के लिए लंबे समय से आवाज उठा रहे अवधेश पन्त राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी एवं शहीद परिवार कल्याण महा परिषद ने सरकार से इस व्यवस्था में तत्काल आवश्यक संशोधन की मांग की है। अवधेश पन्त ने कहा कि प्रदेश में स्वतंत्रता सेनानी आश्रितों के लिए लागू 2 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का उद्देश्य स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान के प्रति राष्ट्र की कृतज्ञता व्यक्त करना था, लेकिन वर्तमान पात्रता और पीढ़ीगत सीमा के कारण इसका वास्तविक लाभ नई पीढ़ी के स्वतंत्रता सेनानी परिवारों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच पा रहा है। संबंधित 1993 के आरक्षण अधिनियम में उत्तराखंड द्वारा समय-समय पर संशोधन किए गए हैं, जिनमें 2009, 2012, 2019/2020, 2025 और 2026 के संशोधन भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता सेनानी परिवारों की दूसरी पीढ़ी आज बड़ी संख्या में निर्धारित आयु सीमा पार कर चुकी है। ऐसे में केवल सीमित पीढ़ी तक आरक्षण रखने से वह उद्देश्य ही कमजोर हो जाता है, जिसके लिए यह विशेष व्यवस्था बनाई गई थी। अवधेश पन्त ने मांग की कि प्रदेश सरकार स्वतंत्रता सेनानी परिवारों को सरकारी सेवाओं में दिए जा रहे वर्तमान 2 प्रतिशत आरक्षण को बढ़ाकर 5 प्रतिशत करे तथा इसका लाभ स्वतंत्रता सेनानी परिवारों की पांचवीं पीढ़ी तक सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने कहा कि इसके लिए संबंधित अधिनियम में आवश्यक संशोधन कर स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र-पुत्री, पौत्र-पौत्री तथा आगे की पात्र पीढ़ियों के लिए स्पष्ट वैधानिक व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। पुत्र और पुत्री की संतानों के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के आगामी चुनाव घोषणा-पत्र में भी स्वतंत्रता सेनानी परिवारों की इस मांग को प्रमुखता से शामिल किया जाना चाहिए तथा सरकार बनने पर इसके लिए विधायी संशोधन की समयबद्ध प्रक्रिया प्रारंभ करने का स्पष्ट संकल्प लिया जाना चाहिए। अवधेश पन्त ने उत्तराखंड में MBBS दाखिलों में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे के कथित फर्जी प्रमाण-पत्रों के इस्तेमाल पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यदि किसी अपात्र व्यक्ति ने फर्जी स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाण-पत्र के आधार पर चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश प्राप्त किया है तो यह न केवल वास्तविक पात्र स्वतंत्रता सेनानी परिवार के हक पर कुठाराघात है, बल्कि आरक्षण व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर विषय है। वर्तमान मामले में देहरादून पुलिस की एसआईटी द्वारा फर्जी स्वतंत्रता सेनानी-आश्रित प्रमाण-पत्रों के आरोपों की जांच की जा रही है। रिपोर्टों के अनुसार कुछ अभ्यर्थियों के दाखिले निरस्त किए गए हैं और जांच का दायरा अन्य संबंधित प्रमाण-पत्रों तक बढ़ाने की मांग भी सामने आई है। अवधेश पन्त ने मांग की कि स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे से एमबीबीएस में दाखिला लेने वाले सभी अभ्यर्थियों के प्रमाण-पत्रों का विशेष सत्यापन कराया जाए। स्वतंत्रता सेनानी प्रमाण-पत्र, आश्रित प्रमाण-पत्र, स्थायी निवास/डोमिसाइल तथा अन्य संबंधित दस्तावेजों का मूल अभिलेखों से मिलान कराया जाए। फर्जी प्रमाण-पत्र जारी करने, सत्यापन करने अथवा उसका उपयोग कर लाभ लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका की निष्पक्ष जांच की जाए। जांच में दोषी पाए जाने पर नियमानुसार आपराधिक एवं विभागीय कार्रवाई की जाए तथा गलत तरीके से प्राप्त प्रवेश/लाभ के संबंध में कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। वास्तविक स्वतंत्रता सेनानी परिवारों के अधिकारों की रक्षा के लिए भविष्य में प्रमाण-पत्र सत्यापन की पारदर्शी और डिजिटल व्यवस्था विकसित की जाए। उन्होंने कहा कि हाल की जांच में कथित फर्जी स्वतंत्रता सेनानी प्रमाण-पत्रों के संबंध में गंभीर अनियमितताओं के संकेत सामने आए हैं; इसलिए पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। अवधेश पन्त ने कहा कि स्वतंत्रता सेनानी परिवार किसी विशेष कृपा की मांग नहीं कर रहे हैं। वे उन परिवारों के सम्मान और अधिकार की मांग कर रहे हैं, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व त्याग दिया। उन्होंने कहा की “एक ओर वास्तविक स्वतंत्रता सेनानी परिवारों को पीढ़ीगत सीमा के कारण आरक्षण का वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा है और दूसरी ओर यदि फर्जी प्रमाण-पत्रों के माध्यम से कोई अपात्र व्यक्ति इस व्यवस्था का लाभ उठाता है तो यह स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान का अपमान है। इसलिए सरकार को दोनों विषयों पर एक साथ गंभीरता से कार्रवाई करनी चाहिए।” उन्होंने पुनः मांग की कि 2 प्रतिशत आरक्षण को 5 प्रतिशत किया जाए और इसे पांचवीं पीढ़ी तक लागू करने के लिए आवश्यक कानूनी संशोधन किया जाए।