संदीप गोयल / एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। असहयोग आंदोलन के दौर में महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध केवल राजनीतिक असहयोग का ही आह्वान नहीं किया, बल्कि विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को भी स्वतंत्रता संघर्ष का महत्वपूर्ण हथियार बनाया। उनका मानना था कि ब्रिटिश शासन की आर्थिक शक्ति को चुनौती दिए बिना राजनीतिक स्वराज की लड़ाई अधूरी रहेगी।
इसी अभियान के अंतर्गत 31 जुलाई 1921 को बंबई में गांधीजी ने विदेशी कपड़ों की सार्वजनिक होली जलाई। यह आयोजन एलफिंस्टन मिल के परिसर में हुआ और इसे स्वदेशी अभियान के महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में देखा गया। गांधीजी ने विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और खादी को अपनाने का आह्वान करते हुए लोगों को अपने दैनिक जीवन में भी स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया।
विदेशी कपड़ों की होली केवल वस्त्र जलाने की घटना नहीं थी। इसके पीछे ब्रिटिश औपनिवेशिक आर्थिक व्यवस्था के विरोध का विचार था। गांधी चाहते थे कि भारतीय विदेशी कपड़ों की खरीद छोड़कर देश में बने वस्त्रों, विशेषकर खादी, को अपनाएं। इससे भारतीय कारीगरों, कतिनों और बुनकरों को रोजगार मिलने के साथ स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देने की संभावना थी।
गांधी के लिए स्वदेशी केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि स्वराज की सामाजिक और नैतिक आधारशिला थी। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार जनता को यह अहसास कराता था कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन का नाम नहीं है, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता भी उसका आवश्यक हिस्सा है।
1921 में विदेशी कपड़ों के बहिष्कार का अभियान तेजी से व्यापक हुआ। गांधीजी ने लोगों से विदेशी कपड़े त्यागने और खादी पहनने की अपील की। इस अभियान में बड़ी संख्या में आम लोग जुड़े। ऐतिहासिक अभिलेखों में भी जुलाई 1921 के दौरान बंबई में विदेशी कपड़ों के बहिष्कार को लेकर गांधीजी की सक्रिय भूमिका का उल्लेख मिलता है।
इसके बाद सितंबर 1921 में मदुरै में गांधीजी ने अपनी पोशाक को और अधिक सादगीपूर्ण बनाते हुए लंगोटी अपनाई। यह परिवर्तन भारतीय गरीब और ग्रामीण जनता के साथ उनकी गहरी एकात्मता का प्रतीक बन गया। गांधी का संदेश स्पष्ट था कि स्वतंत्रता आंदोलन केवल नेताओं का आंदोलन नहीं, बल्कि देश के सबसे गरीब व्यक्ति का भी संघर्ष है।
खादी इसी विचार का प्रतीक बनकर उभरी। चरखा कातना, खादी पहनना और विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार—ये सभी गतिविधियां स्वतंत्रता आंदोलन में राजनीतिक प्रतिरोध के साथ-साथ आर्थिक आत्मनिर्भरता के साधन बन गईं।
गांधी के स्वदेशी विचार में अहिंसक आर्थिक प्रतिरोध की शक्ति दिखाई देती है। अंग्रेजी शासन को चुनौती देने के लिए हथियार उठाने के बजाय उन्होंने जनता की क्रय-शक्ति को राजनीतिक हथियार में बदलने का प्रयास किया। विदेशी वस्तुओं की मांग कम करना और भारतीय उत्पादों को अपनाना ब्रिटिश आर्थिक हितों पर शांतिपूर्ण दबाव बनाने का माध्यम था।
स्वदेशी और खादी के इस अभियान ने स्वतंत्रता आंदोलन को घर-घर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महिलाओं, ग्रामीणों, श्रमिकों और आम नागरिकों की भागीदारी बढ़ी। चरखा राष्ट्रीय आंदोलन की पहचान बना और खादी स्वतंत्रता, आत्मसम्मान तथा आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गई।
विदेशी कपड़ों की होली का वास्तविक संदेश आज भी महत्वपूर्ण है—स्वतंत्रता केवल राजनीतिक अधिकारों से नहीं, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता, श्रम के सम्मान और स्थानीय उत्पादन को प्रोत्साहन देने से भी मजबूत होती है।
गांधी के स्वदेशी अभियान ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को एक ऐसा स्वरूप दिया जिसमें चरखा आंदोलन का प्रतीक बना, खादी आत्मसम्मान का प्रतीक बनी और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार अहिंसक आर्थिक प्रतिरोध का माध्यम बना। यही कारण है कि 1921 का स्वदेशी अभियान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद किया जाता है।