आठ मार्च को होगा श्री झंडे जी का आरोहण

देहरादून, 06 मार्च। आस्था, श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक श्री झंडे जी का आरोहण इस बार आठ मार्च को होगा। साथ ही श्री झंडे जी मेला भी शुरू हो जाएगा। इससे पहले पांच मार्च से गिलाफ सिलाई का काम शुरू हो चुका हैं। इसके बाद 10 मार्च को नगर परिक्रमा निकाली जाएगी। श्री झंडे जी का आरोहण हर साल होली की पंचमी तिथि को किया जाता है। मेला अधिकारी विजय गुलाटी ने बताया कि मेला इस बार आठ मार्च को आरोहण के साथ शुरू होकर 27 मार्च तक चलेगा। सात मार्च को पूर्वी संगत की विदाई होगी। नौ मार्च को संगत दिनभर श्री दरबार साहिब में मत्था टेकेंगी। श्री झंडे जी का आरोहण आठ मार्च को किया जाएगा। सुबह आठ बजे से नौ बजे तक श्री झंडे जी को उतारा जाएगा। इसके बाद स्नान कराकर सादा गिलाफ, शनील गिलाफ चढ़ाने की प्रक्रिया होगी। इसके बाद श्रीमहंत देवेंद्र दास महाराज परिसर में सेवकों को आशीर्वाद देंगे और दर्शनी गिलाफ चढ़ाया जाएगा। शाम को चार से पांच बजे तक श्री झंडे जी का आरोहण होगा। श्री झंडे जी के आरोहण में सबसे मुख्य प्रक्रिया दर्शनी गिलाफ चढ़ाने की होती है। इस बार दर्शनी गिलाफ चढ़ाने का मौका भी देहरादून के परिवार को मिला है। आठ मार्च को दून के पार्क रोड निवासी अनिल कुमार गोयल श्री झंडे जी पर दर्शनी गिलाफ चढ़ाएंगे। ऐसा कई साल बाद हो रहा है कि दर्शनी गिलाफ चढ़ाने का मौका दून के परिवार को मिला है। अनिल कुमार गोयल ने बताया कि उन्होंने करीब 22 साल पहले दर्शनी गिलाफ की बुकिंग कराई थी। इसके बाद अब उनका नंबर आया है। उन्होंने कहा कि दर्शनी गिलाफ चढ़ाने का मौका मिलना प्रभु का आदेश है। इससे पहले वह शनील के गिलाफ भी चढ़ा चुके है। उन्होंने बताया कि जब पता लगा कि इस बार दर्शनी गिलाफ चढ़ाने का मौका उन्हें मिला है तो परिवार में भी खुशी की लहर दौड़ पड़ी। बता दें कि 2025 में दर्शनी गिलाफ चढ़ाने का मौका पंजाब के दो भाइयों को मिला था।
देहरादून का ऐतिहासिक ‘श्री झंडे जी’ मेला सिखों के सातवें गुरु, श्री हर राय जी के ज्येष्ठ पुत्र श्री गुरु राम राय महाराज की याद में मनाया जाता है। उन्होंने वर्ष 1676 में देहरादून में आकर यह विशाल झंडा स्थापित किया था, जो उनके दून आगमन का प्रतीक है। यह मेला होली के पांचवें दिन से शुरू होकर 300 से अधिक वर्षों की परंपरा को दर्शाता है। गुरु राम राय महाराज, जो सिखों के 7वें गुरु हर राय जी के पुत्र थे, ने सन् 1676 में चैत्र मास कृष्ण पक्ष की पंचमी (होली के 5वें दिन) को दून में अपने ‘डेरा’ (दरबार साहिब) में यह झंडा फहराया था। गुरु जी द्वारा ‘डेरा’ डालने के कारण ही इस स्थान का नाम ‘देहरादून’ पड़ा। यह झंडा आस्था, प्रेम, और हिंदू-सिख परंपरा के मिलन का प्रतीक है, जिसे साल के पेड़ (27 मीटर ऊंचे) से तैयार किया जाता है। हर साल पुराने झंडे को उतारकर, दही, घी और गंगाजल से स्नान कराने के बाद नए ‘गिलाफ’ (मलमल के कपड़े) चढाकर इसे फहराया जाता है, जो दर्शन के लिए आकर्षण का केंद्र होता है। यह मेला सदियों पुरानी परंपरा के साथ मनाया जाता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। यह मेला न केवल आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं के लिए भी जाना जाता है।
देहरादून में हर साल आयोजित होने वाले श्री झंडेजी मेले में श्रद्धालुओं की अटूट आस्था है। यही वजह है कि हर देश-विदेश से संगत यहां पहुंचती हैं। महंत देवेंद्र दास महाराज ने संगतों को बताया कि श्री झंडेजी मेले का इतिहास देहरादून के अस्तित्व से जुड़ा है। श्री गुरु राम राय महाराज का दून में आगमन 1676 में हुआ था। उन्होंने यहां के प्राकृतिक सौंदर्य से मुग्ध होकर ऊंची-नीची पहाड़ियों पर जो डेरा बनाया, उसी जगह का नाम डेरादीन से डेरादून और फिर देहरादून हो गया। उन्होंने इस धरती को अपनी कर्मस्थली बनाया। उन्होंने श्री दरबार साहिब में लोक कल्याण के लिए एक विशाल झंडा देहरादून के मध्य स्थान में (बीच में) में लगाकर लोगों को इसी ध्वज से आशीर्वाद प्राप्त करने का संदेश दिया। इसी के साथ श्री झंडा साहिब के दर्शन की परंपरा शुरू हो गई। श्री गुरु राम राय महाराज को देहरादून का संस्थापक कहा जाता है। गुरु राम राय महाराज सिखों के सातवें गुरु गुरु हर राय के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनका जन्म होली के पांचवें दिन वर्ष 1646 को पंजाब के जिला होशियारपुर (अब रोपड़) के कीरतपुर में हुआ था। महंत देवेंद्र दास महाराज ने कहा कि मेले हमारे देश की विरासत और धरोहर हैं। मेलों में देश-विदेश के लोग एकजुट होकर अपनी कला, संस्कृति व संस्कारों का आदान प्रदान करते हैं। मेले हमें जोड़ने का कार्य करते हैं, आपसी सद्भाव और भाईचारे को बढ़ाने का काम करते हैं। दरबार साहिब में पहुंचीं संगतों को महंत देवेंद्र दास महाराज ने श्री गुरु राम राय महाराज के बताए रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने गुरु राम राय महाराज के जीवन से जुड़े संस्मरण भी साझा किए। वहीं, महिलाएं सुबह से ही गिलाफ सिलाई के काम में जुटी थीं। श्री गुरु राम राय महाराज के जयकारों व भजनों के साथ गिलाफ सिलने का काम देर शाम तक पूरा कर लिया गया। श्री झंडेजी पर तीन तरह के गिलाफों का आवरण होता है। सबसे भीतर की ओर सादे गिलाफ चढ़ाए जाते हैं। इनकी संख्या 41 होती है। मध्यभाग में शनील के गिलाफ चढ़ाए जाते हैं, इनकी संख्या 21 होती है। सबसे बाहर की ओर दर्शनी गिलाफ चढ़ाया जाता है। इसकी संख्या एक होती है। इस वर्ष जालंधर के संसार सिंह के परिवार को दर्शनी गिलाफ चढ़ाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।